Thursday, February 16, 2017

बिन गुरु ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोक्ष

गुरुदेवों में सबसे पहले दीक्षित जी याद आते हैं, उम्र कोई चालीस पैंतालीस, कद काठी के मजबूत, देखने में सौम्य, रंग खूब गोरा कि अंग्रेज होने का भ्रम होता था, समय के पाबंद भी इतने कि समझ में नहीं आता था कि वे घड़ी से चलते हैं या घड़ी उनसे. सख्ती के मामले में किसी कसाई से कम नहीं थे, ठुकाई-पिटाई में उनका विश्वास उस काल के गुरुओं के अनुरूप था. घरों में ट्यूशन लगाने का चलन हो गया था. तो दीक्षित जी ट्यूशन पढाने आया करते थे. मै और मेरा भाई, यूँ समझिए कि न पढ़ने पर आमादा थे. स्कूल में मस्ती और उसके बाद पूरी आजादी के साथ मस्ती. जहाँ हमारा घर है उसे नवलखा कहा जाता है, लोग कहते हैं कि राजे रजवाडों के समय इस क्षेत्र में नौ लाख पेड़ हुआ करते थे. चारों तरफ प्राकृतिक वातावरण, जैसा कि आजकल फिल्मों में भी कम दिखाया जाता है. घर में पूजा-पाठ और ईश्वर पर आस्था का माहौल था. दीक्षित जी ढेर सारा होमवर्क देते थे जो हम प्रायः नहीं करते थे. शुरू शुरू में उन्होंने रूटीन की डांट -फटकर और थप्पड़ों से काम चलाया लेकिन जल्द ही मामले को दिल पर लेने लगे. देखने में उनके गोरे हाथ, लाली लिए हुए, बहुत कोमल और सुन्दर दीखते थे, लेकिन जब मारते थे तो लगता था कोई तीसरा हाथ भी है उनके पास. वे सजा देने की ऐसे ऐसे तरीके अपनाने लगे कि मुझे अब लगता है यदि वेसाइंस पढ़े होते तो उनके नाम कई अविष्कार अवश्य दर्ज होते. जब मारपीट का असर नहीं हुआ तो उन्होंने मुर्गा बनाने का संकल्प ले लिया. लेकिन जल्द ही मुर्गा बनने में हम दक्ष हो लिए. दस-पन्द्रह मिनिट में उनका धैर्य टूट जाता लेकिन हमारी हिम्मत कायम रहती. वे किसी दिन एक टांग पर खड़ा करते, कभी उठक बैठक आजमाते. डेढ़ महीने में वे मल्टीटास्क नीति अपनाने लगे. अब वे पढाने वाले गुरु कम फिजियोथेरेपिस्ट ज्यादा लगते थे. लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं जी, कब तक दम भरते आखिर. घंटा भर की फिजियोथेरेपी भारी पडने लगी तो जवाबी कार्रवाई में उनके आते ही शौचालय में बंद हो कर अपनी रक्षा की. सोचा था यह एक दीर्ध कालीन योजना होगी किन्तु तीन चार दिनों बाद ही ये युक्ति बेअसर कर दी गई. आखिर जैसा कि अक्सर होता है, जब कहीं सम्भावना नहीं होती तो लोग ईश्वर की शरण हो लेते हैं. पता नहीं क्यों मुझे ईश्वर में बड़ा विश्वास था. मैंने ईश्वर के पास जा कर प्रार्थना की कि भगवान आज दीक्षित जी ना आयें. ठीक साढ़े चार बजे वे आ जाते थे, पौने पांच हो गए ! पांच हो गए, और उस दिन वे नहीं आये. अब हाल ये कि मेरे तो बस भगवानजी दूसरों न कोई . जैसे तुरुप का इक्का हाथ लग गया. दूसरे दिन साढ़े चार बजे फिर वही प्रार्थना. और उस दिन भी दीक्षित जी के दर्शन नहीं हुए. उत्साह में जबरदस्त इजाफा, मन में जो डर था वो गायब हुआ सा लगने लगा. तीसरे दिन भी साढ़े चार बजे और इधर प्रार्थना का शक्ति परिक्षण शुरू हुआ. लेकिन ये क्या !! दीक्षित जी हाजिर थे ! ईश्वर का ये मजाक मुझे पसंद नहीं आया. भगवान से कुछ नाराजी व्यक्त करते हुए आखिर कसाईवाडे में समर्पित होना पड़ा. दीक्षित जी ने दो दिन की कसर भी पूरी कर ली. उसके बाद कुछ रोज तक प्रार्थनाएं हुईं और जैसा कि होना था ईश्वर पर से मेरा विश्वास उठ गया.
बहुत समय बाद एक गुरुदेव मिसिर जी उत्तर प्रदेश से हमारे घर आये. नवलखा में ही एक सरकारी कालेज है, वहाँ उनकी नौकरी लगी थी, प्रोफ़ेसर हो कर आये थे. हमारा बड़ा परिवार, खूब जगह, आसपास खेत-बगीचे, रहने के लिए कई कमरे, बहुत से खाली, उन दिनों किराये से देने का चलन नहीं था. गुरुदेव ब्राह्मण, सो पूज्य भी. तीस-पैंतीस की उम्र, विनय पूर्वक उन्हें स्थान दिया, वे साथ ही रहने लगे. तीन घंटे कालेज में रह कर लौट आते. एक बड़ा कुँआ था जिस पर सुबह नहाते वे एक मन्त्र सा बोला करते थे  बम्म गौरा टन्न गणेश- पादे गौरा हँसे गणेश. सुन कर हम हँसते. उनके प्रोफ़ेसर होने का खौफ शीघ्र खत्म हो गया. मै मिडिल स्कूल पास हो गया था. गुरुदेव के साथ शतरंज खेलते, चर्चा करते दिन गुजर जाता.  हमारे घर में कुछ किताबें थीं, कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी, प्रेमचंद आदि की और चंद्रकांता संतति वगैरह भी जिन्हें थोड़ा बहुत पढ़ने का मौका मिल रहा था. मिसिरजी ने मेरी रूचि जान कर महेंद्र भल्ला एक उपन्यास दिया भोली-भाली. भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक लड़की अनजाने में सीमा पर कर जाती है और लगातार मुसीबतों में पड़ती है. रोमांचक कहानी थी, हाल में हमने सबरजीत प्रसंग के रूप में इसे देखा है. भल्ला का उपन्यास दूसरी तरफ भी साप्ताहिक हिंदुस्तान में पढ़ा जो विदेशी जमीन पर भारतियों की स्थिति का चित्रण करता है. स्कूल में वार्षिक पत्रिका निकाली जाना थी. छात्रों से रचनाएँ आमंत्रित की गईं थीं. मिसिरजी से कहा कि कुछ बताएं कि कैसे लिखूं, कोई कविता या कोई लेख, कहानी कुछ. उन्होंने कुछ लिखवाया जो जमा नहीं. रचना देने की अंतिम तिथि पास आ रही थी तो किसी कालेज की पत्रिका देते हुए बोले ये लो इसमें से ये दो पेज की कहानी अपने हाथ से लिख कर देदो. उन्होंने बताया कि यह पत्रिका उत्तर प्रदेश की है, यहाँ कोई जान नहीं पायेगा, पूछे तो कहना कि मैंने ही लिखी है. कहानी मैंने जमा कर दी. कुछ दिनों बाद क्लास टीचर ने चलती कक्षा में पूछा कि ये कहानी तुमने लिखी है !? ये मजुमदार सर थे, और सख्त मिजाज थे. मैं डरा, लेकिन कहा कि जी हाँ मैंने लिखी है. इधर आओ, उनका आदेश हुआ. मुझे लगा चोरी पकड़ी गई है, अब शायद पिटाई भी हो सकती है. अपमान का डर, घिघ्घी सी बांध गई. बदन कांप रहा था. लेकिन पास गया तो उन्होंने शाबाशी दी, खूब पीठ ठोकी. लड़कों को कहा कि देखो इस लडके को. इसने इतनी अच्छी कहानी लिखी है. बोले बेटा तुममे बहुत प्रतिभा है. इसी तरह से लिखते रहो. एक दिन तुम बड़े लेखक बनोगे और अपने स्कूल का नाम रौशन करोगे. अब मेरे लिए एक विचित्र अनुभव की स्थिति थी. सच बोलना संभव नहीं था, उतने ही भारी पड़ रहे थे मजुमदार सर के आसीस. दीक्षित जी वाले प्रसंग के बाद पहली बार मुझे भगवान याद आने लगे. सिर झुकाए देख वे और प्रभावित हुए, बोले तुम बहुत विनम्र भी हो, ये अच्छी निशानी है. शाबाश, जाओ, बैठो .
शाम को मैंने यह बात ग्लानी के साथ मिसिर जी को बताई. वे खूब हँसे. बोले –“ ये बढ़िया हुआ. अब कोई कुछ नहीं बोलेगा.... देखो दुनिया ऐसे ही चलती है.
यों तो बात आई गई हो गई. लेकिन सख्त मिजाज मजुमदार सर जब भी मुझे देखते मुस्करा देते. उनकी मुस्कराहट से बचने के लिए मै कोशिश करता कि सामने ना पडूँ. लेकिन मौका आ ही  जाता. एक चोर अंदर ही अंदर मुझे खाए जा रहा था. आखिर एक दिन पत्रिका प्रकाशित हुई और मैंने उसे छुपा लिया, किसी को दिखाया नहीं. मिसिर जी को भी नहीं. वे भूल गए थे, लेकिन मैं नहीं भूल पा रहा था. मन में एक अपराध बोध घर कर गया था. मन बहुत होता कि कोई कहानी खुद लिखूं और चोरी के इस बोझ को उतर दूँ . पढ़ने के शौक में एक  बार मुझे पर्ल बक की किताब हाथ लगी. डायरी की तरह लिखी यह किताब मुझे अच्छी लगी और मैं भी डायरी लिखने लगा. पता नहीं चला कि शब्द कब डायरी से निकल कर रचनाओं में बदलने लगे. जो भी हुआ, आज मैं अपने गुरुदेवों को खूब याद करता हूँ .
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Monday, October 17, 2016

साहित्य को जरूरत है, नोबेल-पुरस्कार की


 प्रभु जोशी


               
यह साहित्य के आगत का बहुत दिलचस्च-दृश्य है कि एक कमजोर बौद्धिक-आधार वाले, बावले भारतीय समाज में, उसकी समझ की चकरी, कभी भी और किसी भी दिशा में घूमती रह सकती है। उसका अब कोई दायां-बायां नहीं है, वह अपनी ही प्रदक्षिणा में लगी हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि उसकी डोर, अब सोशल-मीडिया के हाथ में है, जो पल-प्रतिपल, करवटें ही बदलता रहता है । बहरहाल, जैसे ही अमेरिकी पॉपुलर गायक, बॉब डायलन को साहित्य के नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, हमारे यहां लगे हाथ ‘देसी बॉब डायलन’ ढूंढे जाने लगे। यहां तक कि कुछेक की तो कब्रें खोद कर, उन्हें माला पहनाने की तैयारी होने लगी तो मंच के कुछ जीवित-महानों को, सोशल मीडिया के घोड़े की पीठ पर बैठा कर, अश्वमेध की ध्वजा पकड़ा कर, संसार भर में चक्कर काटने भेज दिया गया । तीसरे और चौथे दर्जे के तुक्कड़ और गलेबाजों ने तो स्वयं ही कण्ठहार अपने गले में डाल लिया और लगा कि अब गीत के दिन लौट आए हैं। 
हमारे यहां मालवी में एक कहावत है कि ‘बावले को मिल गई ‘बाटकी’ [-कटोरी-] तो उसने पानी पी पी-कर अपना पेट फोड़ लिया। बहरहाल, हर्षातिरेक की एक मनोरंजक पराकाष्ठा दिखने लगी है। नोबेल पुरस्कार की घोषणा, एक गीत गायक के नाम होने से, यहां की साहित्यिक बिरादरी ने, उम्मीद में कटोरी संभाल ली ताकि पुरस्कार की खीर उसमें कब गिर जाए।
यह निर्विवाद रूप से सच है कि बॉब डायलन विकसित राष्ट्र और समाज के एक बहुत लोकप्रिय गायक और गीत लेखक हैं। और पश्चिमी-संगीत में जिनकी थोड़ी बहुत भी रूचि रही है, उनके लिए, यह नाम स्फूर्ति भरता भी है। बेशक उन्होंने खासकर साठ के दशक में वामपंथी रुझान के और कई युद्ध विरोधी गीत लिखे-और-गाये हैं , जो अत्यधिक सराहे और पसन्द भी किये गये। मैं , जब आकाशवाणी में ‘युववाणी कार्यक्रम’ देखता था, तो वेस्टर्न-म्युजिक प्रस्तुत करने वाले युवक को कहा करता था कि वह हर कार्यक्रम में, कम-ज-कम एक गीत बॉब डायलन का अवश्य शामिल कर किया करे। कहने की जरूरत नहीं कि बॉब डायलन, अधिकतम लोगों तक, अपनी अधिकतम संप्रेषणीयता भी रखते हैं। लेकिन उनके गीतों को, एक गंभीर साहित्यालोचक के विवेक से देखा जाये तो उन्हें क्या टेण्डिेशियस-राइटिंग से ऊपर का दर्जा दिया जा सकता है ? वैसे तो पॉल राब्सन ने तो अपनी एक प्रतिबध्द दृष्टि को पर्याप्त प्रमाण भी दिया है। कहना ना होगा कि बॉब डायलन तो स्वयं को गायक और डांसमैन कहते रहे हैं। अपनी पापुलर गायन-विधा के लिए 1991 उन्हे ग्रैमी अवार्ड दिया जा चुका है। वे ऑस्कर भी प्राप्त कर चुके हैं तथा ‘रॉक एंड रोल हॉल ऑफ फेम’ में, वे 1988 में ही शामिल कर दिए गए थे। ‘बीटल्स’ और ’बीच-बॉयज’ के साथ सम्मानित भी हो चुके हैं। लेकिन वह अपने समूचे गाये और लिखे हुए से, केवल पॉपुलर में पूजनीय हो सकते हैं, और वे हुए भी हैं, साहित्य में नहीं। उनके प्रति मेरे मन में भी बहुत आादर का भाव ही है। लेकिन, बाजूद इसके उनको साहित्य का ‘नोबेल-सम्मान’ दिया जाना, ऐसी घटना है, जिससे बहुत सारे सवाल उठते हैं और उन सवालों के हमें कुछ तर्क-संगत उत्तरों की जरूरत भीं होगी। 
बहरहाल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बॉब डायलन प्रथमतः तो गायक हैं और उनकी इस मेधा ने ही उन्हें गीत लेखक भी बनाया। इसलिए, उन्हें साहित्य के सम्मान के दायरे में शामिल करने में कुछ महत्वपूर्ण बातों पर विचार करना जरूरी होगा। मसलन, ये स्पष्ट है कि अब संगीत में तकनीक के प्रवेश के बाद, मा़त्र ‘संयोजन’ में बदल गया है और उसने ‘सृजन’ का वह सम्मान खो दिया है। क्योंकि ‘संयोजन’ को उसकी ‘पुनरावृति’ और ’उत्तेजना’ ही, उसकी लोकप्रियता का ढांचा खड़ा करती है। वह बुनियादी रुप से टेलिविजन माध्यम के बढ़ते वर्चस्व के बाद, एक ‘देखी’ और ‘सुनी’ जा सकने वाली विधा है, जो व्यवसाय के शिखर की सीढ़ियां चढ़ती हुई ,पापुलर की प्रतिमा की गढन्त अर्जित कर लेती है।
हम यहां, यह भी याद रखें कि ‘म्यूजिक’ अब इंडस्ट्री है और अगर बॉब डायलन को, दुनिया भर के संगीत-आयोजकों के द्वारा हाथों-हाथ लिया जाता रहा तो उसमें, पापुलर-म्युजिक की व्यावसायिकता की भूमिका रही ही है, जो व्यक्ति को ब्रांड में बदल देती है। फिर उस का क्रेज बिकता है। भारत में ही हम नजर डालें तो भूमण्डलीकरण के बाद से, टेक्नो-म्यूजिक ने हमारे यहां रेहमान को आइकनिक बना दिया है, बस उन्होंने गाने भर लिखने का काम अभी शुरू नहीं किया है। जबकि वे ‘आस्कर-सम्मान’ भी ले चुके हैं। हो सकता है, एक दिन वे पीयूष मिश्रा की तरह के गीत लिखने भी लगें या पीयूष ही रहमान के रास्ते पर निकल आयें, वे भी गाते तो हैं ही। और सेलेब भी बन चुके हैं ।
दरअसल, टेक्नोलॉजी के संगीत-उत्पाद ने, हमारी पूरी की पूरी युवा-पीढ़ी को, अपने अधीन कर लिया है। टेक्नो म्युजिक से बना पॉपुलर, एक तरह से ‘निर्वैयक्तिक की कारीगरी’ कहलाता है, जिसने ‘शाश्वत’ के प्रति, एक घोर निरादर को जन्म दे दिया है। इसी के चलते मात्र मनोरंजन ही ‘कसौटियों की कसौटी’ बन गया है । यह मनोरंजनी चलन पत्रकारिता, संगीत तथा अन्य परफार्मिंग आर्ट में, इसलिए भी स्वीकृत हो गया कि उसके पीछे ‘कल्चर इंडस्ट्री’ का पूंजी-निवेश है।
प्रश्न उठता है कि क्या इन ‘प्रतिमानों’ को साहित्य का मूल्य बनाया जा सकता है ? या कि अभी तक विश्व में, साहित्य में ‘उत्कृष्टता’ का मूल्य-निर्धारण करने वाली संस्था को, अपनी अभी तक की चली आ रही साहित्य की समझ में ही संशोधन की जरूरत पैदा हो गई है ? क्या इसे भी हम कुहन के शब्दों में कहें तो ‘पैराडाइम-शिफ्ट’ कह दिया जाए, ताकि बहस का उपसंहार ही हो जाये ? एंड्रयू रॉस ने अपनी पुस्तक ‘नो रिस्पेक्ट’ में पापुलर के समक्ष, ‘जेन्युइन’ की अवमानना के जख्मों पर उंगली रखकर, चेताया था कि हम एक नई रुग्णता के निकट हैं और हमारे उत्कृष्ट साहित्यिक मूल्य ‘मास-कल्ट’ और ‘मिड-कल्ट’ के बीच मार दिए जाएंगे । साहित्य एक दिन, घुटकर अपना दम तोड़ देगा। 
कहना ना होगा कि वास्तविक साहित्य तो हमेशा से ही दुर्दिन के बीच ही सांस लेता रहा है। चाहे भारत में संस्कृत कवि भारवि ने कहा हो या जॉर्ज लुइस बोर्खेज ने कि ‘उनके साहित्य के पारखी-जन हो सकता है, उनके अपने जीवन में ना हों , लेकिन वे केवल ‘उस सम्भावित पाठक’ के लिए अपने जीवन की ऊर्जा झोंक रहे हैं, जो एक दिन आएगा और उनका ‘वही लिखा हुआ’, पढ़कर आल्हाद से भरकर, यूरेका यूरेका कर बैठेगा ।
कुल मिलाकर प्रश्न यह उठता है कि नोबेल-सम्मान दुनिया का एकमात्र ही पुरस्कार है, जो साहित्य के लिए सम्मानजनक सार्वदेशीय स्वीकृति बनाने वाला रहा है , लेकिन वह इस घटना के बाद से ‘पॉपुलर कल्चर की करंसी’ मैं बदल गया है। यह मनोरंजनमुखी दृष्टि के समक्ष साहित्य की सबसे चिन्ताजनक पराजय है। क्योंकि दुनिया का कोई खराब से खराब भी जनतंत्र भी हो, तो उसमें भी साहित्य की ‘उत्कृष्टता’ को ‘बहुल’ के बीच लोकप्रियता के आधार पर बिलकुल ही तय नहीं किया जा सकता। वहां उत्कृष्टता के निर्णय का आधार ‘बहुमत’ को बनाना, निर्विवाद रूप से अपमानजनक प्रसंग होगा। गीत या संगीत के सहारे भारतीय फिल्मों के कई गीत ऐसे हैं जिन्हें मैं पिछले कई सालों वर्षों से, लगभग एक दो दिन के अन्तराल से, कहीं न कहीं सुनता ही आ रहा हूं। वे अभी भी जीवित हैं । लेकिन क्या उन्हें हम निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ या मुक्तिबोध की कविता से ऊपर का मान सकते हैं ? मसलन गुलजार का गीत ‘जय हो’ ऑस्कर से सम्मानित हो गया। लेकिन वह गुलजार की ही काव्य-प्रतिभा का क्या सहश्रांश भी है ? 
क्या नोबेल पुरस्कार निर्णायकों के समक्ष संसार भर की साहित्यिक बिरादरी में, एक भी ऐसा वास्तविक लेखक-कवि दिखाई नहीं दिया, जो एक पापुलर की विधा के व्यक्ति को, जो सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से पहले ही सम्मानित है, को चुनने को वे विवश हो गए ? क्या समिति को अपनी दृष्टि, ‘तीसरी दुनिया’ के लेखकों की तरफ से नहीं डालनी चाहिए थी ? जिनका प्रतिनिधित्व नोबेल-पुरस्कार के लिये, हमेंशा से ही न्यूनतम ही रहा है। क्या, जेनिफर ईगन, तेहू कोल कार्सन के नामों पर विचार नहीं किया जा सकता था ? यहां तक कि ऑनलाइन पर अपनी कविता की प्रखरता को स्थापित करने वाले वार्सन शाइर सन 2014 का ‘फस्र्ट पोएट लौरेट’ का सम्मान हासिल कर चुके है कि तरफ भी उनकी निगाह नहीं गई। ? बहरहाल, नोबेल-समिति को सोचना चाहिए था कि बॉब डायलन, जिनको इतने सारे सम्मान मिल चुके हैं , उन्हें साहित्य के नोबेल-सम्मान की जरूरत नहीं है। लेकिन साहित्य को नोबेल की बहुत जरूरत है। क्योंकि वह धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जा रहा है और उसने इस वर्ष से तो इस पर से, अपने दावे को खोने की शुरूआत ही कर ही दी है।
हिंदी में एक कहावत है कि उसी के सहारे से, ये आशंका तो प्रकट की ही जाना चाहिये कि मौत ने घर देख लिया है।
प्रभु जोशी, 303, गुलमोहर-निकेतन, वसन्त-विहार, शान्तिनिकेतन के गेट के पास, इन्दौर,


Monday, August 1, 2016

प्रियदर्शन की कहानियाँ

प्रियदर्शन की कहानियाँ महानगरीय परिवेश की होने के बावजूद व्यवस्था को इस तरह से सामने रखती हैं कि सर्वव्यापी लगती है . कथा कथन का अंदाज सीधा पाठक को जोड़ लेता है. शीर्षक कहानी बारिश, धुंवा और दोस्त २४ की उन्मुक्त लड़की और ४२ वर्षीय पुरुष के बीच अपरिभाषित संवेगों को बहुत खूबसूरती से चित्रित करती है . शैफाली चली गई और सुधा का फोन स्त्री मन को अच्छे से पढ़ती हैं. वहीँ घर चले गंगा जी, थप्पड़, बांये हाथ का खेल और उठते क्यों नहीं कासिम  भाई कहानियाँ अपने  चरित्रों के साथ न्याय ही नहीं करती सोचने पर भी विवश करती हैं . प्रियदर्शन की भाषा सरल और आत्मीयता से भरी है जो पाठक को कहानी के प्रवाह में आसानी से ले लेती है. जहां सिस्टम की खामियां आयीं हैं वहाँ भाषा में व्यंग्य का पुट दिखाई देता है. निसंदेह प्रियदर्शन का यह संग्रह न केवल सामान्य पाठकों के बीच बल्कि सहित्य समाज में भी सम्मान प्राप्त करेगा. 

कहानी संग्रह ‘शब्द’ -- बसंत त्रिपाठी

कहानी संग्रह शब्द बसंत त्रिपाठी को एक गंभीर कथाकार के रूप में हमसे परिचित करवाता है. इन कहानियों में समकालीन परिवेश और परिस्थितियों का अच्छा चित्रण है. शैली थोड़ी क्लिष्ट है जो सामान्य पाठक को संभवतः कठिन लगे. कुछ कहानियों में बसंत त्रिपाठी ने परिवेश चित्रण को इतना सूक्ष्म और विस्तारित कर दिया है कि वह गैरजरुरी सा लगने लगता है. हालाँकि संग्रह में उनकी कुछ छोटी कहानियाँ भी बहुत अच्छी हैं, जैसे पिता, अंतिम चित्र और पन्द्रह ग्राम वजन. शीर्षक कहानी शब्द चलन से बहार हो रहे शब्दों को लेकर एक फंतासी में बुनी गई अच्छी रचना है. बसंत त्रिपाठी जो विषय उठाते हैं वह उनके सोच और दृष्टि को दूसरों से भिन्न साबित करती है. कहन शैली में मार्मिकता तो है ही, चिंतन और चिंता भी है. भाषा में कहीं कहीं व्यंग्य और चुटीलापन भी देखने को मिलता है. 

Wednesday, July 27, 2016

सुभाष चन्द्र कुशवाह की कहानियाँ .....

सुभाष चन्द्र कुशवाह के इस कथा संग्रह उत्तर भारत के गांवों कि झलक मिलती है. कहन शैली कुछ कहानियों में दादी-नानी के किस्सों कि याद दिलाती है, जो रोचक भी है. कौवाहंकनी में सुभाष किस्सों को विस्तार दे कर आधुनिक छल-प्रपंच तक ले जाते हैं. वहीँ भटकुइयाँ इनार का खजाना और लाला हरपाल के जूते में लेखक की व्यंग्य दृष्टि मुखर होती है. नई हवा में जहां गाँव में पेप्सी-कोला पहुँच रहे हैं वहीँ जहरीली शराब चुस्की के पाउच भी. लोग बीमार हो रहे है, मर रहे हैं लेकिन सरकारी मदद को ले कर खेंच-पकड़ भी है. जात-बिरादरी, मुखैती, सरपंची के बीच गाँव की प्रधानी पर इस बार दलित महिला का आरक्षण है  जो व्यवस्था की अनेक परतें खोलता है. भौतिक संसार से अलग होने के द्वंद्व में डॉ.अशोक की माई का चित्रण है तो अन्य कहानी में लंगड जोगी हैं जिनकी सारंगी घर वालों ने रखवा ली  है, पाबन्दी का कारण मंदिर-मस्जिद के झगड़े हैं. सुभाष चन्द्र कुशवाह की ये कहानियाँ परपरागत गांवों में बदलाव और संक्रमण को बहुत अच्छे से दिखाने वाला साहित्य का समाजशास्त्र कही जा सकती हैं. मुहावरेदार भाषा, रोचक ग्रामीण परिवेश के नए शब्द भी पाठकों के हिस्से में आते है.

Thursday, July 21, 2016

मानव कौल का कहानी संग्रह

मानव कौल का यह पहला कहानी संग्रह  है जिसमें उनकी बारह कहानियां पाठकों के सामने हैं. मानव बहुमुखी हैं, लेखन के आलावा वे फिल्मों, थिअटर में अभिनय कर रहे हैं. नाटकों का निर्देशन वे करते रहे हैं . काई पो चे  और वजीर जैसी फिल्मों में काम मानव के करियर को रेखांकित करते हैं. किताब के फ्लेप पर लिखा है कि उनके लेखन की तुलना निर्मल वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल के लेखन से की जाती  है. 
संग्रह की सभी कहानियाँ मनोवैज्ञानिक जटिलता और संवेगों के स्वर में हैं. हर कहानी प्रथम पुरुष यानी मैं से शुरू होती है और पाठक को लगता है कि कहानीकार अपनी  आपबीती सुना रहा है. आसपास कहीं, अभी अभी से ...., मौन के बादलकी, टीस आदि कहानियाँ हालाँकि नए ढंग से कही गई हैं किन्तु इनके आंतरिक गठन में इतनी अमूर्तता और क्लिष्टता है कि पाठक को  साथ चलने में कठिनाई होती है. दूसरा आदमी, गुना-भाग , माँ’ ‘मुमताज भाई  पतंग वाले और तोमाय गान शोनाबो अपेक्षाकृत अधिक संप्रेषित होती हैं तो इसलिए कि इनमें पाठक संवाद कर पाता है. कथानक अपनी क्लिष्टता के बावजूद लीक से हट कर हैं और कुछ कहानियों में रोचक भी है. लेकिन सामान्य पाठक के लिए कहानी के अंत तक पहुंचना चुनौती प्रतीत होता है. 
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Thursday, June 16, 2016

एक बादशाह और दो गज जमीन की मुराद

बादशाह बहादुरशाह जफ़र को भारत में मुग़ल शासन के आखरी चराग की तोहमत के साथ याद  किया जाना, सच्चाई के बावजूद  इतिहास की क्रूरता है. वे एक प्रतिभाशाली शायर, कुशल लेखक, उदारवादी शासक और सूफी मिजाज थे. ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा उनकी राजनितिक ताकत लगातार कम की गई बावजूद इसके वे परम्परागत शाही दरबार और शान-ओ-शौकत को कायम रहे रहे. उन्हें अपनी बदकिस्मती का आभास नहीं था ऐसा नहीं है , वे अपनी बेबसी को भी देख रहे थे.
विलियम डेलरिंपल की किताब लास्ट मुग़ल पिछले दिनों से चर्चा में है. जकिया जाहिर ने इसका हिंदी अनुवाद किया है . यह किताब उनके लिए भी बहुत दिलचस्प है जो इतिहास में रस नहीं ले पाते हैं. हिंदुस्तान से मुग़ल साम्राज्य के अंत के वे निर्णायक दिनों को जानना बेहद रोमांचक है.
मई १८५७ की एक सुबह मेरठ से कारतूस में चर्बी होने के सन्दर्भ के साथ तमाम विद्रोही और सैनिक दिल्ली में आ गए और ईसाइयों, अंग्रेजों को जहाँ भी मिले मरते गए. ऐसा ही वे छोटी छोटी जगहों से भी करते और विजयी होते आये थे. जल्द ही दिल्ली उनके कब्जे में थी. चूँकि बादशाह जफ़र देश के एक सर्वमान्य व्यक्ति थे, विद्रोहियों ने उनसे  नेतृत्व, धन, हथियार और अन्य व्यवस्थाओं की आशा की. इधर जफ़र का खजाना खाली था, वे खुद तंगहाल थे. विद्रोहियों को वेतन और खाना तक उपलब्ध नहीं करा सके. नतीजतन विद्रोहियों ने शहर में लूटपाट करना शुरू कर दिया. वे अब जफ़र की इज्जत नहीं करते थे, उन्होंने महल का दुरूपयोग भी शुरू कर दिया था. हताशा और अनिश्चय के इस दौर में अंग्रेज अपनी ताकत इकठ्ठा कर वापस लौटे और हजारों जवाबी हत्याओ के बाद बादशाह भी बगावत के जुर्म में गिरफ्तार कर लिए गए. समय ने करवाट ली और अपना सब कुछ लुटा कर, सोलह में से चौदह बेटों और तमाम बेगमों, रिश्तेदारों, सेवकों, दासियों और शाही रुतबे को आँखों के सामने तबाह देखते हुए ८३ वर्षीय बादशाह आखिर सात अक्टूबर की एक अँधेरी सुबह जब अंग्रेज घड़ियों में तीन बज रहा था, एक बैलगाड़ी में अपनी प्यारी दिल्ली से हमेशा के लिए रुखसत हुए. बाद में उनके साथ तमाम बेअदबी होती रही, मखुल तक उदय जाता रहा. अंत में लंबे मुकदमे के बाद उन्हें दिसंबर १८५७ में रंगून भेज दिया गया. यहाँ बादशाह और उनके खानदान वगैरह  के जिनकी संख्या इकत्तीस थी, खानेपीने का खर्च ग्यारह रूपये प्रतिदिन तय किया गया. सात अक्टूबर १८६२ को सुबह पांच बजे उन्होंने प्राण त्यागे. उनके जनाजे में बमुश्किल सौ-दो सौ लोग जमा हुए जिनमे से ज्यादातर दूसरे कामों से निकले शहरी थे.
लेखक कहते है,--  .... उनकी जिंदगी को नाकामयाबी के अध्ययन की तरह देखा जा सकता है  : आखिर हिंदुस्तान कि गंगा जमुनी तहजीब का अंत उनके दौर में हुआ और १८५७ के गदर में उनका योगदान कतई बहादुरी भरा नहीं था. कुछ इतिहासकार उन पर इल्जाम लगते हैं कि बगावत के दौरान उन्होंने अंग्रेजों से खतो किताबत जारी रखी, कुछ कहते हैं कि उन्होंने बागियों का नेतृत्व करके विजय हासिल करने में रूचि नहीं ली. लेकिन यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि ८२ साल की उम्र में जफर और क्या कर सकते थे. शारीरिक रूप से वह  कमजोर थे, दिमाग थोड़ा असंतुलित हो गया था और उनके पास इतना पैसा नहीं था कि वह सिपाहियों को तनख्वाह तक दे पाते, जो उनके झंडे के नीचे जमा हुए थे. अस्सी साला बुजुर्ग घुडसवार फ़ौज का नेतृत्व नहीं कर सकते थे. उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन बागी फौजों को दिल्ली की लूटमार करने से नहीं रोक पाए.  
ब्लूम्सबरी पब्लिशिंग से प्रकाशित ५८० पेज पूरी किताब १८५७ के उन आठ महीनों के लगभग हर दिन का एक प्रामाणिक ब्यौरा प्रस्तुत करती है. लेखक ने सैकड़ों दस्तावेजों, पत्रों और दूसरे सबूतों से अपने काम उल्लेखनीय बनाया है . खुशवंत सिंग लिखते हैं कि (द लास्ट मुगल) रास्ता दिखाती है कि इतिहास किस तरह लिखा जाना चाहिये .....


अंत में जफ़र कि मशहूर गजल -----

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलमे नापयादर में

उम्रे-दराज मांग कर लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए दी इंतजार में

बुलबुल को पासबां से न सैयाद से गिला
किस्मत में कैद लिखी थी फसले बहार में

कह दो हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ दिले दागदार में

एक शाखे-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा  दिए हैं दिले लालाजार में

दिन जिंदगी के खत्म हुए  शाम हो गई
फैला के पांव सोयेंगे कंजे-मजार में

कितना है बदनसीब जफर  दफ्न के लिए
दोग्ज जमीन भी ना मिली कू-ए-यार में


Monday, June 6, 2016

‘मेक इन इंडिया’ का समाजशास्त्र !!

इन दिनों मेक इन इंडिया की ओर सबका ध्यान है. देश की जनसंख्या  एक सौ बत्तीस करोड़ से अधिक हो गई है. हर साल लगभग एक करोड़ नए हाथ काम मांगने के लिए तैयार हो रहे हैं, जबकि पिछले वर्षों के रह गए बेरोजगारों की बड़ी तादात भी मौजूद होती है. उस पर देश भर में हर कोई चाहता है कि उसे सरकारी नौकरी ही मिले. हर साल एक करोड़ रोजगारों का सृजन करना किसी भी सरकार के लिए असंभव ही कहा  सकता है.
गाँधी जी का मत था कि आजाद भारत में ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को सरकार प्राथमिकता दे, ताकि लोग छोटे उद्योगों में पीढ़ी दर पीढ़ी खपें और धन का विकेन्द्रीकरण भी हो. लेकिन नेहरु वैश्विक प्रवृतियों को देख रहे थे. दुनिया के साथ चलने और बढने के लिए बड़े उद्योग का चुनाव उन्होंने किया. यह नीति कितनी सफल रही है इस पर लंबी बहस हो सकती है, होती रही है. कलकत्ता, कानपुर, दिल्ली, मुंबई, देवास, इंदौर जैसे तमाम औद्योगिक नगरों को याद किया जा सकता है जहां प्रदूषण, भीड़, झुग्गी बस्तियां, अपराध, गन्दगी, बीमारी जैसी दिक्कतें विकराल रूप में मौजूद हैं. नदियाँ, और दूसरे जल स्त्रोत बर्बाद हैं, आज तक हम गंगा और यमुना को भी साफ नहीं कर पाए हैं, जबकि उनसे  धार्मिक भावना भी जुडी हुई है आमजन की. नगरों से पेड़ गायब हैं और हवा हानिकारक हो गई है, झुग्गियों में जीवन नारकीय है.
इतनी बातें  इसलिए याद आ रहीं हैं कि सरकार मेक इन इण्डिया के तहत दुनियाभर के उद्योगों को भारत में आमंत्रित कर रही है. निश्चित ही वे अपने साथ बड़े बड़े उद्योग ले कर आयेंगें, हमारी जमीनों का उपयोग करेंगे (यहाँ ध्यान रखना होगा कि भारत में जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक है और अनुमानों के अनुसार २०३० में देश की जनसंख्या एक सौ बावन करोड़ से अधिक होने जा रही है.) ये उद्योग बिजली और पानी का भी उपयोग करेंगे ( देश में जलसंकट और बिजलीसंकट की स्थिति है.) माना कि बिजली बना लेंगे लेकिन जल का क्या होगा ? पर्यावरण को लेकर अलग से कुछ कहने की जरुरत नहीं है.

फिर यह चिंता भी है कि हमें मिलेगा क्या !? शायद कुछ रोजगार, कुछ टेक्स, उत्पादों पर भारत का नाम, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हम, दूसरे देशों के साथ आर्थिक संबंधों में कुछ लाभ. आज आधुनिक तकनीक में मैन-पावर बहुत काम लगता है. (हमारी कपडा मीलों के अधुनिकीकरण से हजारों लोग बेकार हुए हैं.) आटोमेशन की अत्याधुनिक तकनीक के साथ आने वाले ये उद्योग कितना रोजगार मुहैया करा पाएंगे पता नहीं. टेक्स भी कब मिलेगा ? पहले तो इन्हें ही तमाम छूट देना होंगी तब ये आयेंगे. मुनाफा तो वे अपने देश ही ले जायेंगे. पर्यावरण का क्या होगा, जल, बिजली और यातायात के सम्बन्ध हानि का कोई अनुमान लगाना कठिन हैं. ये कुछ प्रश्न हैं जिन पर निसंदेह विशेषज्ञों ने चिंतन किया होगा. फ़िलहाल इस योजना के लिए ९३० करोड़ का प्रावधान किया गया है लेकिन पूरी योजना पर बीस हजार करोड़ खर्च हो सकता है. सामान्यजन की चिंता मेक इन इंडिया के समाजशास्त्र को समझने की है.
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Friday, June 3, 2016

बिखरे बिखरे से दुनिया के इकलौते सौ करोड़

जब प्रधान मंत्री यह कहते हैं कि सबका साथ, सबका विकास तो उनकी बात पर विश्वास कर लेने को दिल चाहता है. सदियों से हमारे चिन्तक, समाजसुधारक और महापुरुष भी यही चाहते और कहते आये हैं. लोकतंत्र स्थापित हुआ, कानून बनें, शिक्षा बढ़ी, तकनीक का विकास हुआ इसने समाज के पारंपरिक स्वरुप को बदला. विभिन्न सेवाओं के लिए चली आ रही सदियों पुरानी पारस्परिक निर्भरता के बंधन ढीले होने लगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक-आर्थिक स्तर पर भारतीय समाज अच्छी स्थिति में है. मात्र ८०-९० वर्ष पुराना प्रेमचंद के युग का समय तेजी से इतिहास में समा रहा है. लेकिन ग्लोबल समय में रहते हुए हमारी यह खुशफहमी कमजोर दिखाई देती है क्योंकि दूसरे देश दूसरे समाज इस यात्रा में हमसे तेज चल रहे हैं.
दरअसल हम अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं और परम्पराओं तथा तकनीक व सभ्यता के बीच द्वन्द की स्थिति में फंसे दिखाई देते हैं. जुगत सिर्फ इतनी कि जितना लाभ उतना समझौता. ना परम्पराएँ छूट रहीं हैं ना पकड़ी जा रही हैं. भारत में बहुसंख्यक समाज अपने को सौ करोड़ मानते हुए भी उस आत्मविश्वाश में नहीं होता है जिसमें उसे होना चाहिए. वह जानता है कि चार वर्ण और सैकड़ों जातियों में बंटा समाज जिसे चट्टान होना था वह अपनी अवैज्ञानिक सोच के कारण बलूरेत सा चूर चूर है.
विडंबना यह है कि दूसरे समाजों की मौजूदगी और प्रतिस्पर्धा के कारण खुद की एक ताकत भी होना जरुरी है. नकल में अक्सर अकल को नजरंदाज कर दिया जाता है. सामने वाले अपने समूह के प्रति उदार मान्यताओं के कारण कम संख्या में भी मजबूत दिखाई देते हैं. अपनी मान्यताओं को लेकर कट्टरता उन्हें मजबूत बनाती है. जबकि सनातन धर्मी जबाबी कट्टरता के प्रयास में बिखर जाते हैं.
हिंदू समाज के सामने अपने को सामाजिक स्तर पर संगठित करना सदियों से एक चुनौती रही है. हालाँकि समय बदला, हमारी व्यावहारिक समझ बदली, लेकिन सोच नहीं बदली. खासतौर से इनदिनों जबकि छोटी बड़ी जातियां अपने तथाकथित स्वाभिमान और पहचान के लिए रैलियां, जलसे, उत्सव और गौरव ग्रन्थ आदि निकलने में अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं. ऐसा करते वक्त वे आने वाली पीढ़ी को भी उसी मानसिकता में ढालने का काम कर रहे हैं जिससे बाहर आने कि जरुरत है. कहा जाता है कि हिंदू समाज में उदारता बहुत है. हाँ, वह उदार दिखाई देता है, अनेक मामलों में (जिसके विस्तार में जाने की यहाँ गुंजाईश नहीं है) लेकिन अपने ही निम्न तबके, मसलन दलित, पिछड़े और छोटे काम करते हुए गुजरा करने वालों के प्रति वह सामान्यतः असहिष्णु रहा है, जबकि इनकी संख्या आधे से अधिक है. वे आँख की किरकिरी रहे हैं कभी परम्परावादी कारणों से तो इनदिनों आरक्षण जैसे कारणों से. यदि दुनिया की इस इकलौती सौ करोड़ जनसंख्या को एक मजबूत इकाई बनाना है तो उसे एक आतंरिक उदारता का विकास करना जरुरी है. कहने को चार चार शंकराचार्य नेतृत्व दे रहे हैं, हर तीन वर्ष में कुम्भ का समागम होता है लेकिन नहाने-धोने और विवादों के आलावा कुछ हासिल नहीं होता है. तकनीकी विकास और राजनितिक चेतना को छोड़ दिया जाये तो हिंदू समाज में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. सौभाग्यवश लोकतंत्र है और कानून भी अनुकूल हैं. हमें परस्पर उदार होने की जरुरत है, इस नारे के मर्म को समझें- सबका साथ, सबका विकास .


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Monday, May 30, 2016

जनसंख्या किसीके खेलने का सामान न हो .....

           इन दिनों जब देश  के सभी राजनीतिक दल अपने अपने घरेलू मसलों में बुरी तरह से उलझे हुए हैं और चिंतित सरकार भी जश्न  मनाते हुए अपना आत्मविश्वास  बढ़ाने की कोशिश में है तब चुपके से एक आंकड़ा हमें लाल झंड़ा दिखाता नजर आता है और 30 मई 2016 को देश  की जनसंख्या 1,325,378,156 ( एक सौ बत्तीस करोड़, त्रेपन लाख, अठहत्तर हजार, एक सौ  छप्पन ) हो जाने सूचना देता है। हांलाकि अभी भी भारत विश्व  में दूसरे सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश  है लेकिन 2025 में उसका स्थान दुनिया में नम्बर वन हो जाएगा और तब हमारी जनसंख्या 146 करोड़ होगी। इन्टरनेट पर     IndianPopulation clock  दिखाई देती है जिसमें लगभग हर सेकेण्ड के साथ बढ़ती जनसंख्या को देखना एक डरावना अनुभव देता है। ( आप Indian population clock पर क्लिक कर एक बार उस घड़ी को अवश्य देखें ) जनसंख्या घड़ी बताती है कि देश  की जनसंख्या 2050 में एक सौ सत्तर करोड़ हो जाने वाली है तो हमें अपने बच्चों का ध्यान आता है कि वे किस तरह का भयानक जीवन जीने वाले हैं।  

                        आज हमारे पास रोजगार की समस्या है, हर साल लगभग सवा करोड़ की दर से बढ़ रही जनसंख्या के कारण देश  के सामने इतने रोजगार के सृजन की असंभव चुनौती है। हांलाकि सरकार अपने संभव उपायों से संघर्ष करती दिखाई देती है लेकिन अनुकूल परिणाम नहीं मिलते हैं। मेक इन इंडिया एक बड़ी पहल है जिसमें हम विश्व  के तमाम उद्योगो को अपने यहां आमंत्रित कर रहे हैं ताकि लोगों को रोजगार मिले। यह जानते हुए कि उद्योग अपने साथ क्या ले कर आते हैं। हमारा ही अनुभव है कि बड़े उद्योगों ने हमारा पर्यावरण ( जल, वायु, ध्वनि ) कितना खराब किया है। आज हमारी सारी नदियां प्रदूषित हैं, नगर झुग्गी बस्तियों से पीड़ित हैं, धूल-धुंआ और सफाई की समस्या कहां नहीं है। किन्तु हम आज हम मजबूर हैं, और सब जानते हुए भी बड़े उद्योगों के लिए लाल कालीन बिछाना पड़ रही है। 
                            राजनीतिक दलों को बिना लाभ हानि सोचे इस वक्त जनसंख्या को लेकर एकमत होना चाहिए और अपनी पक्ष रखना चाहिए। दुःखद है कि दो बड़े दल अपने अपने कारणों से इस मुद्दे पर चुप लगाए रहते हैं। 1977 के कड़वे अनुभव के बाद कांग्रेस प्रायः जनसंख्या नियंत्रण पर मुखर नहीं होती है और इसके उलट भाजपा में ऐसे लोग हैं जो अनेक बार ज्यादा बच्चे पैदा करने का मशविरा दे चुके हैं। क्षेत्रीय दलों को तो लगता है कि ये उनकी समस्या ही नहीं है। जो बाहर हैं उनकी सारी मशक्कत सत्ता में आने की है और जहां सत्ता में हैं वहां अगली बार फिर सत्ता में बने रहने की जुगत चलती रहती है। कोई भी राज्य अपने यहां की जनसंख्या के प्रति चिंतित दिखाई नहीं देता है। अगर वोट न हों तो गरीबों की ओर वे देखें भी नहीं ( शायद )। भ्रष्टाचार हमारे यहां मुद्दा है लेकिन कुछ नहीं हुआ, वह बढ़ा ही है। मंहगाई मुद्दा होती है लेकिन बढ़ी ही है। इसी तरह बेराजगारी, अपराध, घोटाले, सांप्रदायिकता, जातिवाद, दबंगवाद, पर्यावरण, आवास वगैरह क्या नहीं है जिस पर चर्चा नहीं होती। लेकिन जनसंख्या को कोई छूता नहीं । 
                              जनसंख्या का मुद्दा अगर इसी तरह अछूत बना रहा तो देश  इस पर सोचना भूल जाएगा। माल्थस ने कहा है कि अगर मनुष्य जनसंख्या को लेकर सचेत नहीं होंगे तो प्रकृति को आपदाओं के माध्यम से यह काम करना पड़ेगा। आज हम जलसंकट, आवास, भीड़भाड़, अपराध, फसाद, आदि तमाम दिक्कतों से गुजर रहे हैं। कुछ औंधी सोच के लोग यह कहते भी सुने जाते हैं कि आगे किसी युद्ध के लिए उन्हें जनसंख्या की जरूरत पड़ेगी। मानो जनसंख्या उनके खेलने का सामान हो। अगर ऐसा नहीं होना चाहिए तो एक सौ बत्तीस करोड़ लोगों को जनसंख्या पर सोचना चाहिए। यह अनिवार्य है।
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Thursday, May 26, 2016

यदि मैं प्रस्तुतकर्ता नहीं होता तो कोई और होता ......


   
 वरिष्ठ कवि कृष्णकांत निलोसे का चौथा कविता संग्रह ‘‘समय, शब्द और मैं !’’ शीघ्र प्रकाशित हो रहा है। पूर्वकथन में उन्होंने अपने को जिस तरह से व्यक्त किया, कविता और समय पर जो कहा  है वह मनन करने योग्य है। साहित्य प्रेमियों के लिए यहां प्रस्तुत है --

काल के विस्तार में समय का दृष्य
                              यदि कहा जाए कि ये कविताएं अभिव्यक्त होने के पूर्व भीअपने अस्तित्व में थीं, तो इसका तात्पर्य यही है कि कविता सर्वत्र तथा सर्वकालिक भाव में अपने में अंतर्निहित है। कवि तो मात्र  माध्यम है। समय के आगत और अनागत के बीच जो पुल बनता है, वह है शब्द। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। इसी पुल पर चलता काव्य-पुरूष अपनी आवाजाही करता है। मैं तो मात्र इन कविताओं का प्रस्तुतकर्ता हूं। यदि मैं प्रस्तुतकर्ता नहीं होता तो कोई और होता। लेकिन ये कविताएं अवतरित होतीं जरूर, क्योंकि ये कविताएं समय-शब्द और चेतना /काव्य-पुरूष /की कार्य-कारण अभिव्यक्ति है। वैसे तो इसे संयोग ही माना जाना चाहिए कि मैं इन कविताओं का कवि हूं। परंतु कोई भी संयोग निप्रयोजित या अनायास नहीं होता। काल के अखंड वृहत-विस्तार में समय एक दृष्य है और काव्य-पुरूष एक दृष्टा, जो भाषा या शब्द के माध्यम से अपनी चेतना को अभिव्यक्ति देता है। 
                          जहां एक ओर कविता में अलगाव नहीं होता, तो वहीं सम्पूर्ण लगाव भी नहीं। कविता भला किसको किससे जोड़ेगी ? काव्य-पुरूष को घटना से या अन्य मनुष्य से ? मनुष्य को प्रतिबिंब से, परछाई से ? समय को शब्द से, उच्चारण से ? किन्तु समस्त घटना संसार तो काव्य-पुरूष की आत्मा में ही होता है।
                       कविता, काव्य चेतना है जो केवल जोड़ती नहीं, वह अपने भीतर अभिषिक्त  करती हैं। अभिमान रहित, स्नेह से बुला लाती हैं, लिवा लाती हैं। जन्म-मृत्यु, हास्य-रुदन, आंसू-लहू को, हृदय के शतदल कमल पर आहूत कराती है। सदा आंदोलित, नित्स संघटित घटना को, अविच्छिन्न समय को, अनबोली व्यथा को, अव्यक्त अभिमान को, अबूझ दुःख को, असंपूर्ण उच्चारण को और अनुपलब्ध यंत्रणा को, अपनी सार्वभौम चेतना से अभिषिक्त करती है। 
                                            एक ओर काव्य-पुरुष की अंतरात्मा बिल्कुल निष्कम्प, निर्विकल्प है, वहीं दूसरी ओर, समय अग्नि-शिखा तथा धुंएं का केन्द्र बिन्दु है - अधीर, अस्थिर और आन्दोलित। वहीं जन्म लेती है कविता। बाहर के सारे दृष्य भीतर के अंधेरे में प्रखर ताप से तप्त होते रहते हैं। वहीं राह तलाशता रहता है, ढूंढता रहता है काव्य-पुरुष। इस संकलन की कविताएं निमंत्रण देती हैं: आओ ! एक बार देख लो समय का चेहरा शब्द के दर्पण में।
-- कृष्णकांत निलोसे